इस बार जो गले मिलेगी माँ
कुछ देर वहीं थम जाऊँगा
मुस्काते फूल सी खिलेगी माँ
आँखों को कहीं नम पाऊँगा

इस बार जो पास बैठेगी माँ
कुछ हल्के पैर दबाऊँगा
“मत कर” कहकर ऐंठेगी माँ
मैं भी खूब धौंस जमाऊँगा

इस बार जो खिलाएगी माँ
कुछ ऐसे चाव से खाऊँगा
भरपूर लाड़ मिलाएगी माँ
मैं भी ना रोक लगाऊँगा

इस बार जो बिदा करेगी माँ
कुछ ऐसी लीला रचाऊँगा
जिस भी दिन दीप भरेगी माँ
कर दीवाली घर आऊँगा

माँ से कहा मैंने
आज तेरा दिन है
फिर सोचा मैंने
ना कोई दिन तेरे बिन है

माँ से कहा मैंने
क्या लाऊँ तेरे लिए
फिर सोचा मैंने
सब छोड़ आऊँ तेरे लिए

माँ से कहा मैंने
बता क्या है तेरी चाह
फिर सोचा मैंने
दिल चाहे तेरी पनाह

माँ से कहा मैंने
जो सब था मेरे मन में
फिर सोचा मैंने
बस तेरा होना जीवन में
है ऐसा अद्भुत सा वरदान
जिस बिन ना अस्तित्व इंसान
तुझ संग सदा जुड़ी है जान
पहले तू है फिर भगवान

माँ से कहा मैंने
आज तेरा दिन है
फिर सोचा मैंने
तुझसे मेरा होना मुमकिन है

Silence is often the language of mental health.

During my lowest I went weeks without a word. I wouldn’t (couldn’t) speak or write unless I was prodded to. And even then it felt like a chore that required superhuman effort. No matter how mentally sound we may seem, our frustrations often lie in what goes unsaid between the things that we speak about. It is this silence that needs to be accepted, normalised, empathised with and understood as best possible for the wounds to heal. I was fortunate to have friends and family who saw me through my silence. I’m here if you need me to listen to yours.

A canvas is empty before one draws
Beauty is but only as true as its flaws
Listen to that which stops at “because…”
Poetry is as much prose as it is pause

भूख मिटाने के लिये, भूख जगाना ज़रूरी है
आग बुझाने के लिये, आग सुलगाना ज़रूरी है
भस्म रमाने के लिये, भस्म हो जाना ज़रूरी है
होनी अपनाने के लिये, अनहोनी जी पाना ज़रूरी है

क्या भोर क्या साँझ, तुझसे ही सृष्टि पूरी है
क्या हीर क्या रांझ, तुझसे ही अब फ़ितूरी है
क्या संग क्या अंग, तेरी ख़ुशबू कस्तूरी है
क्या रंग क्या ढंग, बस तू ही तू सिंदूरी है

ये ढीठ समाज, ये रीत रिवाज, दस्तूरी है
ये मीठ मिज़ाज, ये प्रीत इलाज, अंगूरी है
ये मुट्ठी अनाज, ये तख़्त-ओ-ताज, मजबूरी है
तुझ लौ से मिरे, कल औ आज, की नूरी है

तुझ बिन समाप्त, जीवी अभिशाप, अधूरी है
तुझ बिन न प्राप्त, सरगम अलाप, मज़दूरी है
तुझ बिन सब स्थिर, काबा मंदिर, जग धूरी है
तुझ बिन ना मैं, ना मेरा, न उसमें ही अब हूरी है

“I believe that communication satellites can unite mankind.”
“The limits of the possible can only be defined by going beyond them into the impossible.”
“There is hopeful symbolism in the fact that flags do not wave in a vacuum.”
- Dr. Arthur C. Clarke

“…नहीं सूखने दूंगा दीवारों पर लगा…

A compilation of 18 rhymes, together titled ‘A Thousand Words’ because every picture therein speaks of Roshan Panjwani’s photographic genius making it impossible not to scribe my thoughts.

05/08/1935 - 27/07/2017

Left to Right: Dadi, Ruki Aunty, Nani (Friends became Family)

Ek tha suraj, ek tha chanda, ek thi unki behna
They played ojo bojo, left books hit hut, hai na?
Many a late morning, as mum worked far away
Across the bed, stories said, it will all be ok

More makhan than dal, blue bleached rumaal, dahi…

Took a breath, latched on tight
Held my neck, sat upright
Ate my grub, slept the night
Which one of you, is my 42

Spoke a word, focused straight
Chewed my meat, gained weight
Crawled through, walked past gate
Which one of you, is my 42

Trained to poop, ate…

Source: Swades

कुछ बात है यहाँ की कढ़ाई में
भूख जगाए भी
नीयत भराए भी

कुछ बात है यहाँ की चारपाई में
लोरी सुनाए भी
चैन दिलाए भी

कुछ बात है यहाँ की चादर में
देह ओढ़ाए भी
सपने दिखाए भी

कुछ बात है यहाँ की गागर में
प्यास लगाए भी
तृप्त कराए…

An entire generation
Some in frustration
Some in temptation
Many in desperation

Wrote an examination
After years of preparation
Much sleep deprivation
And with 800 expectation

That out there was this nation
With star spangled reputation
Despite its jet laggy location
Which strained every relation

It truly welcomed diversification
And valued…

Prashant Butani

Somewhere between selling satellites, brewing beverages, practising poetry, mining memes and dreaming about my next dip in the sea. 🛰📡☕️✍🏼🌊

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